छठ पूजा: 7 नवंबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य, सूर्य देव की बहन छठ माता की पूजा
छठ पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसमें सूर्य देव और छठी माता की पूजा की जाती है। इस साल छठ पूजा का महापर्व 7 नवंबर को मनाया जाएगा, जब श्रद्धालु डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे और अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य चढ़ाकर इस चार दिवसीय पर्व का समापन करेंगे। छठ पूजा में सूर्य देव को जल चढ़ाकर और व्रत रखकर उनकी आराधना की जाती है, जिससे भक्त अपने परिवार और समाज के लिए सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा में सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि वे जीवन और ऊर्जा के स्रोत माने जाते हैं। माना जाता है कि छठ पूजा के दौरान सूर्य देव अपनी बहन छठ माता के साथ आते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। छठ माता को समर्पित यह पर्व उनकी कृपा प्राप्त करने का अनूठा अवसर है।
पूजा का क्रम
छठ पूजा चार दिनों का पर्व है, जिसमें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य का विशेष महत्व होता है।
- पहला दिन (नहाय-खाय): छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है, जिसमें व्रती (व्रत रखने वाले) स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं।
- दूसरा दिन (खरना): खरना के दिन व्रती निर्जल रहते हैं और शाम को प्रसाद के रूप में खीर और रोटी का सेवन करते हैं। इस प्रसाद का एक विशेष महत्व है और इसे बेहद पवित्र माना जाता है।
- तीसरा दिन (संध्या अर्घ्य): इस दिन व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस अवसर पर वे जल में खड़े होकर सूर्य देव की उपासना करते हैं और संध्या को सूर्य को जल अर्पित करते हैं।
- चौथा दिन (उषा अर्घ्य): अगले दिन सूर्योदय के समय उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जिससे इस महापर्व का समापन होता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
छठ पूजा का संबंध न केवल धार्मिक आस्था से है बल्कि इसमें प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की जाती है। सूर्य की पूजा सेहत, शक्ति, और आत्मबल प्राप्त करने का प्रतीक है। इस पर्व का पालन ज्यादातर बिहार, झारखंड, और उत्तर प्रदेश में किया जाता है, लेकिन अब यह पूरी दुनिया में भारतीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।
सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व
सूर्य देव को जल अर्पण करने की परंपरा में निहित आध्यात्मिक संदेश है। माना जाता है कि सूर्य को अर्घ्य देने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है। इस पर्व में नदी, तालाब, या अन्य किसी जलाशय के किनारे खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
