लेबनान ने हाल ही में खुलासा किया है कि हिज़्बुल्लाह के चीफ सीजफायर के लिए तैयार हो गए थे, और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इस पर सहमत थे, लेकिन बाद में इजराइल ने अपना इरादा बदल दिया। यह बयान तब आया है जब इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। लेबनान सरकार के अनुसार, सीजफायर के लिए बातचीत में अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप भी हुआ था, जिसमें अमेरिका और फ्रांस ने युद्ध को रोकने के लिए दबाव डाला था।
सीजफायर पर बनी थी सहमति
लेबनान के अधिकारियों ने कहा कि हिजबुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह ने शुरुआती बातचीत के बाद सीजफायर पर सहमति व्यक्त की थी। वहीं, इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू भी इसके लिए तैयार थे। इस समझौते के पीछे अमेरिका और फ्रांस का भी समर्थन था, जिन्होंने दोनों पक्षों से जंग को रोकने का आग्रह किया था।
नेतन्याहू ने बदला इरादा
हालांकि, लेबनानी अधिकारियों का दावा है कि अंतिम क्षणों में इजराइली सरकार ने अपना रुख बदल लिया और सीजफायर को खारिज कर दिया। नेतन्याहू ने इसे सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए सीजफायर पर आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। यह बदलाव तब आया जब इजराइल की सेना और हिज़्बुल्लाह के बीच मुठभेड़ और बढ़ गई।
US और फ्रांस की भूमिका
अमेरिका और फ्रांस दोनों ने इस क्षेत्र में शांति कायम रखने के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास किए हैं। दोनों देशों ने इजराइल और हिज़्बुल्लाह से युद्धविराम का पालन करने की अपील की थी, ताकि क्षेत्र में बढ़ती हिंसा को रोका जा सके। फ्रांस, जो लेबनान के साथ ऐतिहासिक संबंध रखता है, ने इस मुद्दे पर कूटनीतिक सक्रियता दिखाई थी।
वर्तमान हालात
हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच मौजूदा तनाव ने लेबनान के हालात को और गंभीर बना दिया है। लेबनान पहले से ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा है, और अब इस सैन्य तनाव से देश की स्थिति और बिगड़ सकती है। हिजबुल्लाह की गतिविधियों से इजराइल के साथ संघर्ष और बढ़ने की संभावना है, जिससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।
