प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही लाओस के दो दिवसीय दौरे पर जाएंगे, जहां वे आसियान-भारत समिट में भाग लेंगे। इस समिट का उद्देश्य भारत और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना और विभिन्न आर्थिक, सुरक्षा और सांस्कृतिक मुद्दों पर चर्चा करना है। आसियान (ASEAN) 10 दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का एक समूह है, जो क्षेत्रीय विकास और सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आसियान-भारत समिट का महत्व
यह समिट भारत और आसियान देशों के बीच रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाने का एक महत्वपूर्ण मंच है। भारत और आसियान के बीच 1992 से साझेदारी चल रही है, जिसे 2012 में “स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” का दर्जा दिया गया था। इस समिट में व्यापार, डिजिटल कनेक्टिविटी, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी प्रयास, और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर चर्चा होगी।
द्विपक्षीय वार्ता और अन्य बैठकें
समिट के दौरान पीएम मोदी आसियान के विभिन्न सदस्य देशों के नेताओं से द्विपक्षीय वार्ताएं भी करेंगे। इन बैठकों में आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा, और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। लाओस दौरे के दौरान पीएम मोदी की मुलाकातें क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं और व्यापार के अवसरों को बढ़ावा देने पर केंद्रित होंगी।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत भारत की भूमिका
भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के तहत यह दौरा अहम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देना है। आसियान के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी इस नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक है।
समिट के संभावित परिणाम
समिट से यह उम्मीद की जा रही है कि भारत और आसियान के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग के मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श होगा, जिसमें विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, और आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर ध्यान दिया जाएगा। यह दौरा भारत और आसियान देशों के बीच एक नए दौर की शुरुआत कर सकता है, जिससे दोनों पक्षों के बीच सामरिक और आर्थिक सहयोग को और गति मिलेगी।
PM मोदी का यह दौरा भारत के दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंधों को और मजबूती देने का एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, जिससे भारत की वैश्विक रणनीति को भी बल मिलेगा।

