तालिबान ने भारतीय पीएचडी छात्र को बनाया राजनयिक: मुंबई के वाणिज्य दूतावास में नियुक्ति, भारत ने मान्यता देने से किया इनकार
तालिबान ने भारत में एक पीएचडी छात्र को राजनयिक के रूप में नियुक्त करके एक नई कूटनीतिक चाल चली है। मुंबई के वाणिज्य दूतावास में इस अफगान छात्र को राजनयिक पद पर नियुक्त किया गया है, लेकिन भारत सरकार ने तालिबान द्वारा भेजे गए इस राजनयिक को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है।
राजनयिक नियुक्ति का विवाद
तालिबान ने हाल ही में अफगानिस्तान के एक भारतीय पीएचडी छात्र को मुंबई में अपने वाणिज्य दूतावास में नियुक्त किया, जो पहले से ही भारत में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। तालिबान ने उसे राजनयिक के रूप में नियुक्त कर भारत के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश की है। हालाँकि, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं देता है और इसलिए उसके किसी भी प्रतिनिधि को राजनयिक मान्यता देने का सवाल ही नहीं उठता।
भारत का रुख और कारण
भारत तालिबान सरकार को अब तक आधिकारिक मान्यता नहीं देता है। भारत का मानना है कि तालिबान के अधीन अफगानिस्तान में कई सुरक्षा और मानवाधिकार संबंधी मुद्दे बने हुए हैं। भारत ने पहले भी स्पष्ट किया है कि वह किसी भी ऐसे समूह को मान्यता नहीं देगा, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन नहीं करता और जिसकी सरकार अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी नहीं उतरती।
तालिबान की कूटनीति के मायने
भारत में राजनयिक नियुक्ति करने का तालिबान का यह कदम अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने के लिए उसकी एक और कोशिश है। तालिबान कई देशों से कूटनीतिक समर्थन पाने की कोशिश कर रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता मिले। हालांकि, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश इस तरह की कोशिशों से प्रभावित नहीं होते और उन्होंने तालिबान के प्रतिनिधि को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस कदम को लेकर सतर्क है। अन्य देशों ने भी तालिबान के इस कदम को ध्यान में रखते हुए कहा है कि बिना लोकतांत्रिक और समावेशी सरकार के तालिबान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी जा सकती।
