महाभारत के वीर योद्धा कर्ण को उनकी दानवीरता और संघर्षपूर्ण जीवन के लिए जाना जाता है। उनकी मृत्यु के बाद जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे, तो उनके साथ एक अद्भुत घटना घटी। कर्ण, जिन्हें “दानवीर कर्ण” के नाम से जाना जाता था, धरती पर अपने जीवनकाल में कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते थे। उनके इसी गुण को देखते हुए स्वर्ग में उनके साथ एक विशेष घटना हुई, जिसे पौराणिक कथाओं में विशेष स्थान दिया गया है।
कर्ण की स्वर्ग यात्रा
महाभारत के युद्ध में जब कर्ण वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनका आत्मा स्वर्ग में पहुंचा। वहां पर उनके अद्भुत दानवीरता और त्याग के कारण देवताओं ने उन्हें विशेष सम्मान दिया। लेकिन कर्ण को स्वर्ग में भोजन के रूप में केवल सोने के आभूषण दिए गए। कर्ण ने भगवान इंद्र से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है।
दानवीरता का परिणाम
भगवान इंद्र ने कर्ण को बताया कि धरती पर अपने जीवनकाल में उन्होंने हर प्रकार का दान किया, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान नहीं किया था। कर्ण ने उत्तर दिया कि उन्हें अपने असली पूर्वजों के बारे में पता ही नहीं था, इसलिए उन्होंने उनके लिए कोई अन्न दान नहीं किया। यह सुनकर इंद्र ने कर्ण को 15 दिनों के लिए धरती पर वापस जाने की अनुमति दी, ताकि वे अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान कर सकें।
स्वर्णस्पर्श की शक्ति
कर्ण की अद्वितीय दानशीलता और त्याग से प्रभावित होकर देवताओं ने उन्हें वरदान दिया कि स्वर्ग में उनका शरीर इतना पवित्र और दिव्य हो गया है कि जिस वस्तु को भी कर्ण छूते, वह सोने में बदल जाती। यह वरदान कर्ण के दानवीरता और उनके अद्भुत चरित्र को दर्शाता है।
कहानी का यह भाग यह बताता है कि कर्ण का जीवन कितना महान और दानशील था, और उनकी दानवीरता ने उन्हें अमरत्व और दिव्यता प्रदान की। उनकी यह शक्ति भी उनके त्याग और पुण्य कर्मों का परिणाम थी, जो उन्हें स्वर्ग में प्राप्त हुआ।

