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अनंत महादेवन ने सुनाया विनोद खन्ना की ‘इंसाफ’ का किस्सा: बोले- टिकट के लिए 1 किलोमीटर लंबी लाइन लगती थी; 1987 में रिलीज हुई थी फिल्म

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फिल्म निर्माता और निर्देशक अनंत महादेवन ने हाल ही में बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता विनोद खन्ना की 1987 में आई फिल्म ‘इंसाफ’ को लेकर एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। महादेवन ने बताया कि इस फिल्म के रिलीज के दौरान टिकट के लिए इतनी भारी भीड़ होती थी कि सिनेमाघरों के बाहर 1 किलोमीटर लंबी लाइन लगती थी। उनकी यह यादें 1980 के दशक के फिल्मी माहौल को उजागर करती हैं, जब स्टार पावर और फिल्म के हिट होने के लिए दर्शकों की भारी तादाद जरूरी हुआ करती थी।

‘इंसाफ’ फिल्म का योगदान और सफलता

फिल्म ‘इंसाफ’ 1987 में रिलीज हुई थी और इसमें विनोद खन्ना, ऋषि कपूर और मीनाक्षी शेषाद्रि मुख्य भूमिका में थे। फिल्म को अनंत महादेवन ने भी याद करते हुए कहा कि उस समय एक्शन और ड्रामा फिल्मों का जबरदस्त ट्रेंड था, और ‘इंसाफ’ ने इस ट्रेंड को और बढ़ावा दिया। फिल्म का विषय न्याय, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानताओं पर आधारित था, जो उस समय के दर्शकों के लिए बेहद आकर्षक था।

अनंत महादेवन ने बताया कि फिल्म के रिलीज के समय सिनेमाघरों के बाहर लोगों की भीड़ इतनी ज्यादा होती थी कि टिकट खरीदने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगती थीं। सिनेमाघरों के पास एक किलोमीटर लंबी लाइन तक लग जाती थी, क्योंकि लोग इस फिल्म को बड़े पर्दे पर देखने के लिए बेताब थे।

विनोद खन्ना की भूमिका

विनोद खन्ना ने इस फिल्म में एक संघर्षशील इंसान की भूमिका निभाई थी, जो न्याय के लिए लड़ता है। उनका किरदार दर्शकों के दिलों में गहरा प्रभाव छोड़ गया। उनकी दमदार एक्टिंग और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस ने इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता दिलाई।

फिल्म के हिट होने के कारण

महादेवन ने यह भी बताया कि उस समय के दर्शक सिनेमा हॉल में ज्यादा वक्त बिताना पसंद करते थे, और फिल्म के एक्शन और डायलॉग्स ने उन्हें खींच लिया था। ‘इंसाफ’ जैसी फिल्मों के दौर में दर्शकों के बीच स्टार कनेक्शन और फिल्म के मुद्दे पर आधारित कहानियां बहुत प्रचलित थी। इस फिल्म के हिट होने का एक बड़ा कारण इसके सामाजिक मुद्दों पर आधारित ट्रीटमेंट भी था।

सिनेमा की बदलती दुनिया

अनंत महादेवन ने यह भी कहा कि सिनेमा की दुनिया आज काफी बदल चुकी है, लेकिन 1980 और 90 के दशक के फिल्मी माहौल में स्टार्स का दबदबा हुआ करता था। उस समय फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में हो रहे बदलावों पर प्रकाश डालने का एक माध्यम बनती थीं।

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