नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ अपने पहले विदेश दौरे पर चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं, जो एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव का संकेत है। नेपाल में 64 साल पुरानी परंपरा रही है कि नया प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के पहले आधिकारिक विदेश दौरे के लिए सबसे पहले भारत का दौरा करता है। प्रचंड का चीन दौरा इस परंपरा को तोड़ेगा, और यह भारत-नेपाल संबंधों में एक नई दिशा की ओर इशारा कर सकता है।
नेपाल के प्रधानमंत्री का पहले भारत दौरा करना एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा थी, जो दोनों देशों के करीबी राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है। लेकिन प्रचंड का चीन दौरा बताता है कि अब नेपाल अपनी विदेश नीति में विविधता लाना चाहता है। नेपाल हाल के वर्षों में भारत और चीन दोनों से संतुलित संबंध बनाने पर जोर दे रहा है।
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता केपी शर्मा ओली को अभी तक भारत की ओर से कोई आधिकारिक न्योता नहीं मिला है। यह घटना भारत-नेपाल रिश्तों में आए ठंडेपन का संकेत है। ओली के कार्यकाल में भारत के साथ कई मुद्दों पर विवाद हुआ था, जिसमें सीमा विवाद भी शामिल था।
प्रचंड के इस दौरे से यह स्पष्ट है कि नेपाल अब चीन के साथ अपने आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर संबंध मजबूत करना चाहता है। नेपाल को चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत कई योजनाओं से लाभ मिलने की उम्मीद है।
प्रचंड का चीन दौरा और ओली को भारत का न्योता न मिलने की स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक संकेत है कि नेपाल अपनी विदेश नीति को लेकर अब स्वतंत्रता और संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है।
