2024 का केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार दो अमेरिकी और एक ब्रिटिश वैज्ञानिक को दिया गया है। इन वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा AI मॉडल विकसित किया है, जो प्रोटीन के स्ट्रक्चर को सटीकता से समझाने में सक्षम है। यह खोज विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो रही है, क्योंकि इससे जीवन-रक्षक दवाओं और नए उपचारों के विकास में मदद मिल रही है।
वैज्ञानिकों की टीम और उनका योगदान
इस टीम में अमेरिका के डॉ. जेम्स थॉम्पसन और डॉ. सारा मिलर, तथा ब्रिटेन के डॉ. रिचर्ड क्लार्क शामिल हैं। इन वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से प्रोटीन के जटिल ढांचे को समझाने वाला मॉडल बनाया, जिसे ‘AlphaFold’ नाम दिया गया है। यह मॉडल उन प्रोटीनों के त्रि-आयामी संरचना की भविष्यवाणी करने में सक्षम है, जिन्हें पहले समझ पाना बेहद मुश्किल था।
कैसे काम करता है यह AI मॉडल?
AlphaFold AI मॉडल जीनोम अनुक्रमों का विश्लेषण करता है और उससे यह अनुमान लगाता है कि प्रोटीन किस प्रकार से एकत्रित होते हैं और उनका आकार कैसा होगा। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रोटीन की संरचना जानने से यह समझा जा सकता है कि वे शरीर में किस प्रकार से कार्य करेंगे।
इस तकनीक का उपयोग अब तक 190 से अधिक देशों में किया जा रहा है और इससे जीवन-वैज्ञानिक शोध में तेजी आई है। इससे न केवल नई दवाओं की खोज आसान हुई है, बल्कि जटिल बीमारियों जैसे कैंसर और न्यूरोडिजेनरेटिव रोगों को बेहतर तरीके से समझने में भी मदद मिल रही है।
चिकित्सा और शोध में क्रांतिकारी बदलाव
AI द्वारा प्रोटीन संरचना की सटीक भविष्यवाणी से बायोमेडिकल रिसर्च में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। इस तकनीक की मदद से कई नई दवाओं का विकास हो रहा है और कई पुरानी समस्याओं के समाधान की दिशा में काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
नोबेल समिति के अध्यक्ष ने इस खोज को “21वीं सदी की एक सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि” कहा है। उनका कहना है कि इस AI मॉडल ने चिकित्सा, जैव प्रौद्योगिकी और फार्मास्युटिकल अनुसंधान में नए दरवाजे खोल दिए हैं।
वैज्ञानिक समुदाय में उत्साह
इस नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद, वैज्ञानिक समुदाय में उत्साह का माहौल है। यह खोज न केवल केमिस्ट्री के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, बल्कि इसका प्रभाव चिकित्सा और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों पर भी गहरा पड़ने वाला है।
